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Tuesday, May 12, 2020

The Untold Story of My First Short Film..!!

Feb. 2015, 
सुबह फेसबुक पर एक खबर ने दिमाग में खलबली मचा दी, यह पोस्ट थी टेलेंटहाउस वेबसाइट से, जो एक मोबाइल फिल्म फ़ैस्टिवल का आयोजन कर रही थी यानी मोबाइल से शॉर्ट फिल्म बनानी थी।
2013 के बाद से मैं फिल्मो और कहानियों से बहुत दूर था, क्यों था? यह मेरे जीवन की पहली फिल्म का किस्सा है, जिसे मैं जल्द ही बताऊंगा लेकिन आज बात सिर्फ "पागलपन्ती" की करेंगे। दिन भर फिल्म समारोह के बारे में जानकारी हासिल की और 3 बजे से अपने घर की कोचिंग में व्यस्त हो गया और शाम को रामनगर वाली कोचिंग में। 
मैं सायं 8 बजे, बच्चो को पढ़ा कर, रामघाट रोड से होते हुए सेंटर पॉइंट आ रहा था, अपने बचपन के मित्र नितिन को फोन कर के वहाँ बुला लिया था, हम दोनो को ही फिल्म्स के लिये एक समान पागलपन था, इसलिये शुरुआती समय जीवन का फिल्म्स के खुमार में आसानी से कट गया था। खैर, वो वहाँ पहुँचने वाला था और मैं भी, जहाँ अक्सर हर दिन ही मोमोस खाने के बहाने मैं अपने दोस्तो से मिला करता था, जगह थी "ईट ऐण्ड जॉय" नामक रेस्टोरेंट। जैसे ही नितिन पहुँचा मैने उसे बताया कि मुझे एक फिल्म बनानी है, कहानी मैने सोच ली है और तू उसमे एक किरदार करेगा मेरे साथ, दो किरदार और है वो बाद में ढूंढ लेंगे, लेकिन भाई मोबाइल कहाँ से लाये जो 1920×1080 का हिसाब बन जाये, हम दोनो पर ही उस समय ऐसे मोबाइल नही थे। मेरे पास सैमसंग गैलेक्सी कोर 2 था, और नितिन के पास कोई माईक्रोमेक्स का, दोनो ही 1280×720 वाले थे, खेर जब मन बन गया तो फोने ढूंढ़ ही लेना था हम ने। 
फोन और बाकी दो किरदार को ढूंढ़ने का सिलसिला जारी हुआ, सब से पहले फोन के लिये अपने एक मित्र तारिक़ की याद आयी, जिसके पास एक नया और चमचमाता फोन तो था, लेकिन उस से शूट करना मुमकिन हो नही पाया, जमालपुर की एक चाय की दुकान पर हो रही इस चर्चा से हम मायूस हो कर लौटे। खैर, एक किरदार मिल गया था साथ में फोन की खोज भी जारी रही, "कुश शुक्ला" एक 16 वर्ष का बालक याद आया और हम उस से मिलने ग्रीन पार्क पहुँचे नितिन साथ मैं ही था। नितिन एक ऐसा लंगोटिया मित्र रहा बचपन से जो सिर्फ मलमूत्र और कुछ प्रसंगो के अलावा विश्व के हर क्षेत्र में मेरे साथ ही रहता था। खैर हम ने कहानी का एक हिस्सा कुश को सुनाया और वहाँ मौजूद एक प्लॉट की दीवार पर बैठ कर यह तय कर लिया कि तीसरा किरदार कुश ही होगा। बातों बातों में फोन का जिक्र हुआ और कुश ने एक प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव हमारे लिये खुशियों की सौगात लाने वाला था, कि जो एक किरदार बाकी है, उस में उसके बड़े भाई से बात की जा सकती है, वो मुंबई में काफी अच्छा समय बिता चुके थे तब तक, इस क्षेत्र में जागरुक भी थे, अगर वो मान जायें तो उनके फोन से फिल्म शूट हो जायेगी, लेकिन समस्या यह थी कि इस किरदार को फिल्म में पिटना, दौडना और भागना ही था, और वो क्या राजी हो जायेंगे? खैर सब सही रहा और वो राजी हुए। 
खुशी की लहर दिल से लेकर ज़िस्म तक दौड रही थी, दो वर्ष बाद मैं फिल्म बना रहा था, उत्सुकता की सीमा नही थी, आता कुछ भी नही था, ना कोई कोर्स किया था ना किसी प्रकार का कोई अनुभव, ना कैमरे की समझ ना फ्रेम की, ना लाईट की जानकारी ना साउंड की, बस सपने थे, उड़ने के, कुछ करने के, सिनेमा के साथ जीने और साथ ही मरने के। तो बात तय हुई और हमने पहला दिन शूट किया रेल की पटरी पर, जेल रोड की तरफ, कुश पहली बार काम कर रहा था तो उसे काफी देर तक समझाया गया की हसीं रोकनी है अपनी, बस जो करना है वो असलियत लगना चाहिये, क्योंकि इतना ही मुझको भी आता था। नितिन ने मोबाइल सम्भाला, फ्रेम में थे मैं और कुश और देखते देखते पहला दृश्य पूर्ण हुआ, फिर दूसरा कुश की ताई के घर जो वहाँ पास में था। अगले दिन शाम को कुश के भाई लव शुक्ला के साथ कार ले जा कर दृश्य स्वर्ण जयंति नगर के मोड़ पर फिल्माया गया, अन्धेरे में रोशनी के लिये मोबाइल की फ्लेश चालू रखी गयी और साथ में कार की हेड़ लाईट भी। दो दिन के फिल्मांकन के बाद लव शुक्ला जी को कहीं जाना था, और हमे तय समय में फिल्म भी पूरी करनी थी, तो हमने कुछ दृश्य जो सिर्फ मुझ पर फिल्माए जाने थे उन्हे अपने एक भाई आलोक के आई फोन से नितिन की सहायता से मल्खान सिंह हॉस्पिटल, अलीगढ मुस्लिम विश्वविधालय, ईट ऐण्ड जॉय रेस्टोरेंट पर फिल्मा लिया। कुछ दिन के इंतज़ार के बाद, लव शुक्ला जी के लौटने पर फिल्म के क्लाईमेक्स को शूट करने की प्रक्रिया शुरु हुई, और लोकेशन के लिये एक दिन पहले जा कर नक़्वी पार्क में मैने और नितिन ने जगह तय कर दी और अगले दिन शाम 5 बजे से हमने फिल्मांकन शुरु किया। इस बार फ्रेम में थे नितिन व मैं और फोन को थामा था कुश ने, 1 घन्टे के बाद हमने यह दृश्य पूर्ण कर लिया और फिर अपने अपने घर की ओर प्रस्थान किया। डाटा इकटठा करने के बाद शुरु हुई एक नयी मुसीबत, फिल्म को एडिट कैसे किया जाये, ये ना मेरे बस में था ना किसी मेरे जानकार के। ऑनलाइन जो कुछ था उसमे वाटरमार्क आता था, तो हमने तय किया कि दिल्ली के किसी एडिटर से यह कार्य कराया जाये, और फेसबुक की सहायता से रणधीर से मुलाक़ात हुई और 2 बजे की गोमती एक्सप्रेस पकड कर अलीगढ से दिल्ली रवाना हुए मैं और नितिन दोनो। दिल्ली पहुँच कर, जी.टी.बी. नगर मैट्रो स्टेशन पहुँचे और रणधीर के साथ एडिटिंग स्टुडियो। शाम के डिनर के बाद शुरु हुई एडिटिंग, पूरी रात जाग कर यह कार्य पूर्ण किया, साथ में सीखा रॉयल्टी फ़्री म्यूज़िक के बारे में। नितिन पीछे बड़े सोफे पर लेट कर सो गया था। सुबह 4 बजे हमने पूरी फिल्म तैयार कर ली थी। 800 रुपए में किये गये इस कार्य को करवाने की दो वजह थी, एक रणधीर जैसे मित्र का मिलना, और दूसरा यह एडिटींग किस चिड़िया का नाम है यह देखना, जानना और सीखना था। खैर 3 मई 2015 की सुबह नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस से अलीगढ़ पहुचे हम और साथ में हमारे थी एक फिल्म। खुश थे, उत्सुक भी कि आगे अब रास्ते खुलेंगे, देखते ही फिल्म को फिल्म समारोह में भेजा गया, हालांकि  यह फिल्म जीत तो ना सकी पर टेलेन्टहाउस की वेबसाइट पर अपनी फिल्म को देख कर जो हर्ष हुआ वो शायद अब तक मेरे जेहन में है। 
शुरुआत में यह फिल्म, सायलेंट फिल्म थी, बिना डायलाग की। 2015 में ही इसे रिलीज भी किया था अपने यूट्यूब पर लेकिन कुछ संकोच के चलते इसे डिलीट कर दिया। कुछ समय बाद मैने एडिटिंग जैसी टूटी फटी सीखी, इस पर कर दी, साथ में गोविंद बाजपाई जी की आवाज का सहारा भी लिया और फिर से इसे नये सिरे से तैयार किया, डायलाग्स के साथ। इसके साथ ही मैने अपनी पहली शॉर्ट फिल्म, "स्ट्रेन्जर ऐण्ड आई" जिसको मैने 2013 में बनाया था, की भी एडिटिंग की जिसे 2015 तक मैने कभी छुआ ही नही था। उसका किस्सा मैं अगली पोस्ट में बताऊंगा। जुलाई 2016 में मेरे लैपटॉप की ड्राइव क्रेश हुई और मैने अपनी कई फिल्मो को एक साथ खो दिया, तब तक इतने साधन और अनुभव व जानकारी नही थी मुझे इसलिये इस घटना ने मुझे बहुत हताश किया था पर अच्छा यह हुआ की उस समय मैने इन दोनो फिल्मो को दिल्ली के द्वारका में अपने मित्र रणधीर के प्रोडक्शन के सिस्टम में सेव कर रखा था जो मुझे मार्च 2017 में प्राप्त हुई और अब कोरोना महामारी के चलते मुझे समय मिला कि मैं अब इसे 5 वर्ष उपरांत आपके बीच ला सकूँ और आपको अपने अनुभवो से अवगत करा सकूँ, उम्मीद करता हूँ यह किस्सा आपको पसंद आये। 

- आपका सलिल
12 मई 2020

2 comments:

  1. It was a great journey....
    Always loved to work with you..
    All d very best..
    U Will get more n more success in ur life..

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  2. Arre wahhh Kya baat hai
    Maine bhi Aapse bahut kuchh seekha h
    Khair ab ye quads goi chahte rhege aur Aap aur hum aage badte rhege

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