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Friday, March 22, 2019

महंगे किरदार और सस्ते चरित्र..!!

   आजकल किरदार महंगे और चरित्र बहुत सस्ते हो गए है, सिर्फ नाजुक से शब्दों से यह चरित्र टूट कर मिट्टी में मिल जाते है वो भी ऐसे मनुष्य और सोच के लिए जो ना माएने रखते और ना ही हमारे किसी लायक। क्या कोई दूसरा हमारा चरित्र प्रमाणित करेगा जो खुद अंदर से खोखला हो एहसासों के नाम पर?
गलतफहमी और एहसासों के अभाव में किरदार और चरित्र को मिला कर अगर आप अपने एहसास को ब्यान अपने शब्दों में करते हो तो वो भी इतने ही खोखले है जितने आपकी अच्छी सोच पर आपका गलत आचरण क्यूंकी कमल कीचड़ में खिल कर गंदा नहीं खास हो जाता है पर अगर आप कमल ना बन कर सिर्फ कीचड़ के लिए अपना सारा व्यवहार और अपना सारा कीमती वक़्त दे रहे तो यह आपकी भूल है और कोई दूसरा आपको यह एहसास करा ही नहीं सकता जब तक आप स्वयं ना एहसास कर ले। मित्रता सिर्फ एक कंबल नहीं ज़िसकी आड़ में आप सच और अपनी गलतियां छूपा कर उम्मीद करते रहे की कोई आपसे कुछ ना कहे और आप अपने महंगे किरदार में खोये रहें। वक़्त का सिलसिला और दिल में एहसास को तवज्जो दी जाए तो बेहतर है, क्यूंकी चरित्र और किरदार आपकी समझ और सोच से बेहतर बनते है, किसी दुसरे के प्रमाणित करने से नहीं।
कौन आपको सही कौन आपको गलत समझ रहा यह भी अगर आप तय करना चाहते है तो माफ कीजिये आप खुद के किरदार और चरित्र का हनन कर रहे है और फिर उसमे अपनी नाकामी को छूपा कर अपने वक़्त और हालातो का दोष बता कर आप खुद के साथ उस हर शख्स को तकलीफ दे रहे है जाने अंजाने में जो आपके बुरे वक़्त में आपके साथ है। मिट्टी के खिलोने जैसे इन नाजुक किरदारो और चरित्र से बाहर आकर खुद को नए सिरे से ढून्ढिये, मत भूलिये जब भूकंप और सुनामी कुदरत को तबाह करते है तब पृथ्वी उन्हे दोष नहीं देती और ना भूकंप सुनामी पृथ्वी और उसके मनुष्यो से चरित्र प्रमाण मांगते है। जो गलत है वो गलत है, सच बस यह है कि जो होना है होगा बस. कुदरत की तरह दोबारा खड़ा होना और स्वयं परवान चड़ना सिखिये, रुकिये मत। अक्सर रुकने वालो से ही दुनिया रास्ता पूछ कर आगे बड़ जाती है।

नोट: यह मत कहो की सब अपने हालातों से सीख कर समझते है, आप हमारे हालातों में नही, आप नही समझोगे, जानता हूँ यह सच है पर जो कोई आप से पहले इन हालातो से गुजर चुका हो और आपसे बेहतर समझता हो तो उसे मानिये और समझिये क्यूंकी फिर गीता, पुराण, वेद और उपनिषद में लिखी कही बाते जो आप मान लेते हो वो आपने नही लिखी, ना आपने जी है। शब्दों पर ना जा कर यह समझिये की हमने आपके सामने गन्ना रख दिया है, गर्मी आ रही है, तो इस बहाने से अपनी गर्मी निकालिये। गन्ना निचोड कर रस आपको ही निकाल कर पीना पड़ेगा, समझ सके तो मीठा नहीं तो अंदर चल रहे मन्थन से विष भी निकल सकता है और माफ कीजियेगा यहाँ अब कोई ये विष पी कर आपको अम्रत तो देने नही वाला...

- सलिल सिंह
22 मार्च 2019

यथार्थ और उसकी दुनिया...❤

कहीं पढ़ा था एक बार मैने,  न किसी से ईर्ष्या न किसी से होड़,  मेरी अपनी मंज़िलें.. मेरी अपनी दौड़... मैं ऐसा ही तो हूँ।। वो कहते हैं ना कि वक...