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Sunday, May 1, 2022

यथार्थ और उसकी दुनिया...❤

कहीं पढ़ा था एक बार मैने, 

न किसी से ईर्ष्या न किसी से होड़, 
मेरी अपनी मंज़िलें.. मेरी अपनी दौड़...

मैं ऐसा ही तो हूँ।।
वो कहते हैं ना कि वक्त कभी एक सा नहीं रहता, कभी आपके साथ कभी आपके खिलाफ लेकिन पता है इंसान के लिए वक्त का सबसे खूबसूरत हिस्सा क्या होता है? वह लम्हा जब वक्त इंसान के हक में पलटता है।
2018 से 2019 तक वक्त शायद मेरे हिस्से में नहीं था, हादसों पर हादसों ने मुझे ठहरने पर मजबूर कर दिया और फिर सारी दुनिया भी ठहरी, 2 वर्ष हवा की तरह कहाँ धूमिल हो गए पता ही नहीं चला। इतना समय काफी था खुद को वापस समेटने और नए रास्ते तलाशने के लिए। जब मैं अपने दिमाग की ज़द्दोज़हद से लड़ रहा था तब अक्सर ऐसे कई ख्याल आते थे जिनके जवाब तलाशने का मन करता था लेकिन सही मायने में कुछ सवालों के जवाब होते ही नहीं है और इस प्रकार इतने सारे हजारों सवालों ने एक कहानी का रूप ले लिया, जो मुझे करीब से जानते हैं वह समझते हैं कि मैं किस प्रसंग की बात कर रहा हूँ। अक्टूबर 2021 में तय कर लिया कि अब शुरू से ही शुरू करते हैं बिल्कुल शून्य से जो जहाँ जैसा सीखा समझा जाना सब शून्य करते हैं क्योंकि जिद आज भी वही है कि जो करना है अपनी शर्तों पर करना है और इसी जिद ने कब एक नये ख्वाब का रूप ले लिया पता ही नहीं चला मुझे। दिसंबर आते आते यह तय हो गया कि नए वर्ष में नए रूप और नई पहचान को अपनाना होगा और फिर शुरू हुआ एक नया सफर, सफर यथार्थ का जो मुझसे बिल्कुल भी नहीं मिलता बिल्कुल भी नहीं। इस तरह तो आपने मुझे कभी देखा ही नहीं होगा, शायद पहचानने में भी मुश्किल हो क्योंकि सबसे बड़ी बात यह थी कि यथार्थ की तरह दिखा कैसे जाये? खेर यह तो अब फिल्म ही बतायेगी कि मैं कितना कामयाब हुआ यथार्थ जैसे दिखने में? यथार्थ का मतलब सत्य होता है और इस फिल्म के शुरुआत से ही कई सत्य मेरे सामने थे कि इतनी बड़ी फिल्म क्या मैं खुद बना पाऊँगा? अकेले इतना कुछ संभाल पाऊँगा? क्या ऐसे कलाकारो को सहेज पाऊंगा जो मेरी तरह जिद्दी और महत्वाकांक्षाओं से भरे हो? जिन में सिर्फ कला के लिये जुझारूपन हो, अहम और लालच का स्थान ना हो क्योंकि यथार्थ जैसी फिल्म तभी बन सकती है जब समर्पण पूर्ण हो, यही सब फिक्र थी कि क्या इतना बड़ा ख्वाब और उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी मैं संभाल पाऊंगा? मेरा भगवान और मेरा परिवार जानता है मैंने कितनी हिम्मत की है इस फिल्म के ख्वाब को देखने में, उसे संवारने और पूरा करने में। अब जब यथार्थ की शूटिंग पूरी हो चुकी है तो ईमानदारी से कह सकता हूँ कि एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है मैंने क्योंकि आज से पहले ना इससे बेहतर कुछ किया है ना ही मैंने ऐसा कुछ सोचा था। यह एक ऐसी कहानी है जिसके एक दो नहीं बल्कि ना जाने कितने अंत हो सकते हैं यह तो मुझे इस वक्त भी नहीं पता, इस कहानी के अंत की संभावना निकाल पाना आज तो क्या उस वक़्त भी आसान नही रहा जब इसे लिख रहा था।
शुरुआत में कुछ नए नियम बने, नई टीम बनाई और फिर शुरू हुआ कहानी को फिल्म बनाने का सफर। कृष्ण भक्त को सबसे पहले जो मिला वह महादेव का ही भक्त मिला जिसे प्यार से मैंने हनुमान कहा, खैर वो अकेला हनुमान नहीं था मेरा पर वह बात बाद में। हाँ, तो जिक्र एक ऐसे कलाकार का जो जितना मेहनती है उतना ही सरल भी... नाम है, "मोहित"। गाज़ियाबाद से है और फिल्म में अहम किरदार के साथ साथ और भी कई महत्त्वपूर्ण कार्यो को पुर्ण ज़िम्मेदारी के साथ किया है। मोहित जिस दिन शामिल हुआ उसके अगले दिन ही यह फिल्म शुरू हो गयी। कार सीखना, पहाड़ों में कूद जाना, बर्फ पर दौड़ लगाना, फिल्म के खास लम्हे कैद करना, ऐसे ना जाने कितने ही किस्सो में मोहित का नाम दर्ज हो गया यथार्थ की यादों में। यथार्थ में शामिल हर कलाकार का अपना ही किस्सा है। मोहित के बाद शामिल हुए चंदन जो बिहार से है और यथार्थ के लिये मुख्य केमरा संचालन का कार्य कर रहे है। फिर उत्कर्ष जो प्रयागराज से है, फिल्म में सहायक केमरा संचालन का जिम्मा संभाल रहे है। हरीश जो पंजाब से है और फिर गोविंद जी जो दिल्ली से है। इन उम्दा कलाकारो ने बेहद ही महत्त्वपूर्ण किरदारो में अपनी मौजूदगी दर्ज करायी है और फिर जिक्र मेरी दोनों कल्पनाओं का जिसमे पहली इत्तेफाक से मिल गई दूसरी किस्मत से।

शुरु हुआ दौर यथार्थ के बनने का।।।
17 फरवरी को दिल्ली से मनाली जाने का सफर शुरू हुआ, मैं पहली बार मोहित से मिला, उत्कर्ष से एक बार मिल चुका था और चंदन को तो पाँच छह सालों से जानता ही था। मनाली की बर्फ और हसीं वादियो में कौन खोना नहीं चाहता और यथार्थ तो खुद को ढूंढने गया था या शायद हम सब अपनी अपनी तलाश में निकले थे। पहला सफर इतना आसान भी नहीं था जितना हमने सोचा, पर्वतों में रास्ते आसान होते ही कहाँ है? पर पर्वतों से मोहब्बत रास्तों को अक्सर आसान कर देती है। 6 दिन कब बीत गए पता नहीं चला बहुत कुछ घटा, बहुत कुछ जिया, बहुत कुछ सीखा। माता हिडिंबा से आशीर्वाद प्राप्त कर सबसे पहले अपनी स्क्रिप्ट का पूजन किया और फिल्म शुरू करने की अनुमति मांगी। सोलाँग, कोठी से रोहतांग तक ऐसा कुछ नहीं बचा जो हमने कैद ना किया हो, हमारे हनुमान ने तो एक दृश्य फिल्माने के लिए व्यास नदी तक की सफाई कर दी, ऐसे अनगिनत खूबसूरत लम्हे याद बनकर हमेशा के लिए मेरी यादों में रहेंगे। एक बार तो दृश्य फिल्माते समय मैंने जो भी छुआ मुझे करंट लगने लगा यह भी अजीब घटना ही थी, सही समय पर उपाय हुआ और वापस शूट शुरू हुआ। मनाली में कुछ अच्छे साथी बने जैसे हमारे होटल के निशु भाई जिनकी वजह से हम बिना रोक टोक के कुछ भी कर सकते थे और पास में खाने वाली आंटी जिनके परांठे, चाय और आमलेट ने बड़ा साथ दिया लेकिन जिसका सबसे ज्यादा शुक्रगुजार हूँ वह है सपना, जिसने ना सिर्फ मनाली की सबसे खूबसूरत जगह से वाकिफ कराया बल्कि अपना इतना समय भी दिया और यथार्थ को अपनी मौजूदगी से और खास बना दिया। सपना आप एक उम्दा कलाकार के साथ एक बेहद ही उम्दा इंसान भी हो, ईश्वर आपको सुकून और आपके हर स्वप्न को पूर्ण करें।
मनाली में जिए एक एक दिन को आज जब मैं पलट कर देखता हूँ तो बहुत ही याद आतें है वो सब लम्हे। घण्टो पैदल चलना, रात भर शूट करना, अंजान जगहो पर बेझिझक चले जाना, मेरा बर्फ में लेट कर सब पर चिल्लाना, मोहित का पहली बार पहाड़ों में कार चलाना, एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बर्फ पर चलना, वो नदी किनारे चाय पी कर मेगी खाना, कोठी में एक दृश्य के सूट ना होने पर लड़ाई करना, मेरा अचानक ड्राइवर को उतारकर गाड़ी को मनाली की तरफ ले चलना, ऐसे कितने ही किस्से मुझे अब याद आते हैं, मैं वापस आऊंगा मनाली इन सारी यादों को फिर से जीने, यथार्थ के साथ वापस आऊंगा यह वादा है।

23 फरवरी को वापस दिल्ली लौटे, हम अपना पहला शेड्यूल पूरा कर के। मन में बहुत सारे सवाल और अधूरे जवाब थे लेकिन खुशी थी कि कुछ बड़ा कर लौट रहे हैं और फिर हमारा दूसरा पड़ाव था कृष्ण की नगरी।
मथुरा वृंदावन में 26 फरवरी से हमारा यह शेड्यूल पूरी तरह इंडोर रहा, फिल्म शुरू होने के बाद पहली बार कृष्ण की नगरी में थे तो मंदिर जाए बिना तो रह ही नहीं सकते। शूट के आखिरी दिन टीम के साथ वृंदावन की गलियों में था, मंदिरों में आशीर्वाद लिया और कई यादगार लम्हे जीवन की डायरी में दर्ज किए।
और फिर शुरु हुआ कुछ दिन का इंतजार लेकिन इसमें कुछ ऐसे बाकिये भी थे जिन्हें याद नहीं रखना चाहता, जिनकी वजह से मुझे कुछ दृश्य फिर से फिल्मानें पड़े, और कुछ शायद फिल्मां ना सकूँ क्योंकि अब फिर से उसी रूप में वापस मनाली नही जा सकते। एक बात है दोस्ती में और प्रोफ़ेशन में अंतर होना चाहिये, जो शायद मैने नही किया, फिल्मों में जो आप का दोस्त हो जरूरी नही आप उस पर भरोसा ही करो, कभी कभी टूट भी जाता है और आप एक शब्द नहीं कह पाते, एक पल ऐसा था जब लगा अब क्या होगा?? भगवान के भरोसे थे हम... अब उस से लड़ भी नही सकते, खेर जो उसने तय किया है वो हम तब कहाँ ही जान पाते है, कहाँ जान पाते है कि उसने सबसे बेहतर ढूंढ कर रखा था। उस से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था, यथार्थ के लिए। मैंने और मोहित ने उम्मीद ही तोड़ दी थी कि कौन होगी कल्पना? और फिर वह मिली जिसे कृष्णा ने चुना होगा शायद।
फिर शुरू हुआ तीसरा पड़ाव, रंगों में रंग जाने का सिलसिला शुरू हुआ क्योंकि होली का जश्न था और बात होली की हो तो ब्रज की होली से बेहतर पूरे ब्रह्मांड में क्या ही होगा। 15 फरवरी से शुरू हमारे इस शेड्यूल में दो नए साथी शामिल हुए। एक थी ईशा, यथार्थ की कल्पना और दूसरी आशी। एक अजीब किस्सा यह है कि जिसे रंगों से सरोवार होना था उसे रंगों से ही ऐतराज था लेकिन कहते हैं ना उसके अपने तरीके है। ईशा, बहुत मुश्किल हुई होगी मैं समझता हूँ लेकिन इतने प्रयास जो तुमने किए उसके लिए यथार्थ की टीम और मैं तुम्हारा आभारी रहूँगा। वृंदावन में हर तरफ रंग और हर्षोल्लास ने एक अलग ही समा बांधा हुआ था, जैसे हम भूल ही गए कि हम फिल्म के लिए आए हैं। यहाँ हर दृश्य मुझे दो बार फिल्माना था और हर बार वही सब कर पाना बेहद मुश्किल होता है, बाकी सब हमने कृष्णा पर छोड़ा है।
वैसे भी मुश्किलें और अड़चने होना तो हमेशा से स्वभाविक है और यह हमारे साथ भी हुआ लेकिन अंत भला तो सब भला। बहुत कुछ सीखा इन दिनों में मैने, कई बार आप से छोटे आप को कितना कुछ सिखाते है, आशी कि ऐसी कुछ बातें हमेशा याद रहेंगी जो मैने उस से सीखी। ऐसे ही हमारे ना जाने कितने यादगार लम्हे सिमट गए और हम वापस अपनी मंजिल पर फिर से लौट गए।
27 मार्च को मनाली के कुछ बचे हुए दृश्य फिल्माए गए और इस बार हम अलीगढ़ में थे, मेरे शहर में। इस बार एक ही जगह तीन शिव थे। हर्ष, शिवम और शुभम का आभार जिनकी वजह से फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण दृश्य फिल्माया जा सका।

9 अप्रैल को हम वापस मिले, इस बार जगह थी दिल वालों की दिल्ली, यहाँ फिल्माए गए दृश्य फिल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा है। शुरुआत थोड़ी मुश्किल से हुई लेकिन अंत आते आते सब अच्छा था। लगा ही नही हम एक फीचर फिल्म शूट कर रहे है, यकीनन यह बहुत ही प्यारा एहसास जैसा था, हम लोग महादेव की बातें करते, कैदारनाथ जाने की प्लानिंग करते, चाय पीने जाते तो एक की दो पीते, यकीनन आप सब के साथ ने मुझे बहुत प्रभावित किया। यहाँ विजय की बहुत मदद मिली फिर चाहे पर्दे लाना हो या मेट्रो के लिए परमिशन दिलाना। यथार्थ और कल्पना के न जाने कितने ही लम्हे मेरे जेहन में दर्ज हैं जिन्हें याद करके कभी भावुक भी होता हूँ तो कभी हंसता भी हूँ, ईशा तुम्हारा ऐक्टिंग के बीच में वो अजीबोगरीब चेहरे बनाना, मैं क्या कहूँ तुम्हे बता ही देता हूँ, ये लम्हे मेरे साथ जीवन भर रहेंगे। दिल्ली का पूरा फिल्मांकन समाप्त होने के बाद, हम फिल्म के आखिरी पड़ाव में पहुँचे और यह सबसे मुश्किल होने वाला था। यह हमने सोचा ही नहीं, बिल्कुल भी नहीं।

इस नये और अन्तिम पड़ाव में, तीन दिन तीन शहर और तीन नए कलाकारों का फिल्म से जुड़ना यकीनन बेहद ही उम्दा एहसास था। 16 अप्रैल को हम नोएडा मिले, वैसे नोएडा जाने का कोई ख्याल ही नहीं था वह तो कहते हैं ना कि कभी-कभी दिल खुश नहीं होता वही मेरे साथ हुआ और मैंने मोहित से कहा और फिर क्या था चल दिए नॉएडा सिर्फ एक दृश्य फिल्माने। नॉएडा में जिसका सबसे महत्वपूर्ण योगदान है वो है मोहित के जीजा जी, सौरभ जी। आपका बहुत बहुत आभार जो आपने इतनी मदद की, यकीन मानिए यह इकलौता दिन था यथार्थ फिल्म का जहाँ मैं इतने सुकून में था, आपको बहुत प्यार और आभार जीजू। साथ ही वहाँ मौजूद हर शक्स का शुक्रिया जिसने इतनी मेहनत की और हमारे दिन को खास बना दिया। इसी दिन बहुत दिनों बाद साथ में थे गोविंद जी। उनका साथ और आशीर्वाद तब से मिला है जब से मैंने शुरुआत की, इतने वर्षों बाद काम में अचानक उनका शामिल हो जाना हम सबके लिए आशीर्वाद ही था। साथ में आलोक का शामिल होना भी सोने पर सुहागा रहा उसकी तबीयत थोड़ी नासाज थी लेकिन उसके अभिनय में उसकी कमी नही छलकी, वो एक कलाकार के रूप और उभरा है। उसी रात अलीगढ़ लौट रहे थे और रास्ते में जेवर में हमने एक ऐसा दृश्य फिल्माया जिसकी कल्पना हम भी नही कर सकते थे, बस इतना कहूँगा कि हमने आग लगायी है, आग।
अगली सुबह फिर से तैयार थे हरीश के साथ जिसके आने के बाद एक नया एहसास आ गया काम में, इतने सालो बाद काम करने में मजा आया, तुम्हारी इतनी व्यस्तता के बावजूद बिना सवाल-जवाब के फिल्म के लिए समय देना वाकई तारीफ के काबिल है मेरे भाई, फिर चाहे धूप में रेल ट्रैक पर शूट करना हो या नींबू पानी पीकर बार में दारू का माहौल बनाना। फिर से अपने पुराने दिन याद आ गए, तुम्हारा तहे दिल से शुक्रिया और ढेर सारा प्यार। बार में शूट करते समय महेश अंकल और उनके पुत्र यश से मुलाकात हुई, बेहद ही उम्दा इंसान हो आप अंकल, बहुत अच्छा लगा आप से मिल कर। आप के द्वारा बोली गयी बातें में ध्यान रखुंगा।
मेरे जीवन में बहुत कम हुआ है कि किसी के सामने रो पडूँ लेकिन इस रात ऐसा भी कुछ पल के लिए हुआ था, शायद दिल खुश था या फिर वह इंसान बेहतरीन था।

अगली सुबह मैं जानता था कि फिल्म शूट का आखिरी दिन है, सुबह से ही दिल भारी था लेकिन इतना समय आप मेहनत करते हो, हर दिन एक किरदार के साथ जीते हो। दुनिया जानती है एक फिल्मकार के लिए उसकी फिल्म उसका बच्चा होती है और मेरे ख्वाबों में यथार्थ सबसे कीमती है जो मैंने आज तक कुछ किया। जैसे-जैसे आगरा पहुँच रहा था सोच और समझ का दायरा भी कम हो रहा था क्योंकि जो जो आप सोचते हो अक्सर वैसा नहीं होता, आज आखिरी दिन फिल्म का सबसे शुरुआती दृश्य फिल्माने वाले थे यह अपने आप में एक अजीब बात थी। सारा दिन काम किया हम सब ने और आगरा की गर्मी ने हमारा स्वागत भी अच्छे से किया जिसका खुमार अब तक नहीं उतरा है। मेहताब बाग से जब लौटने लगे तब कहीं मेरे जज्बातों ने मेरा साथ छोड़ दिया था यकीनन उस समय जो हुआ वह किसी भी फिल्मकार कहानीकार के लिए मुश्किल घड़ी होती है, हम ताजमहल आ चुके थे लेकिन मेरे जेहन में वही बाकी था जो इतने महीनों से अब तक जीवंत किया था मैंने। आखिरकार हमारे 2 महीने का सफर और मेरे पिछले कई वर्षों की तपस्या पूर्ण रूप ले चुकी थी और फिर कदम वापस घर की ओर चले, शाम को जब ताजमहल से वापस लौट रहा था, आँखो में खुशी के आंसू थे। एक-एक कदम जैसे-जैसे मुख्य द्वार की तरफ बढ़ रहे थे मेरे अंतर्मन में हर वह लम्हा, हर वह पल जो हमने पिछले कुछ महीनों में बिताए एकाएक सामने आ गए, उस पल ये था कि किसी अपने को गले लगाकर बता सकूँ कि मैंने एक मंजिल पा ली है। शायद इंसान ना सही, मेरा कृष्ण ही वहाँ आ जाता पर एक रिक्शेवाले ने मेरी आँखों के आँसू देख मुझसे पूछ ही लिया, क्या हुआ भैया? और मैंने उससे मुस्कुरा कर कहा मैंने अपनी फिल्म का शूट पूरा किया है, अपने ख्वाबों का सफर पूरा कर लिया है। खेर फिर लौट चले हम सब अपनी अपनी मंजिल की ओर, जैसे सूरज डूबते ही पंछी अपने अपने घोंसलों की ओर निकल पड़ते हैं। 
करीब 3 महीन, हम सब एक परिवार की तरह रहे और जैसा परिवार में होता है कभी खुशियाँ कभी गुस्सा कभी नाराजगी, हम सब का साथ भी ऐसा ही रहा, उम्मीद करता हूँ आप सब भी इस फिल्म को देखने के लिये उतने ही बेसबर होंगे जितना मैं और वैसे भी हम इस फिल्म से कई मिथक तोड़ने वाले है, जो कहते है ना फिल्म बनाना बच्चो का खेल नही, यकीनन सच कह्ते है लेकिन यह इतना मुश्किल भी नही, नियत और नियती का खेल है सब। 
अब यहाँ से एक नया सफर शुरू होगा, जितना अब तक किया उस से कहीं ज्यादा मुश्किल और लम्बे इंतज़ार का सफर, बेशुमार मेहनत और काली रातों का सफर, एक अधूरे ख्वाब को पूरा करने का सफर, यहाँ से आगे बढ़ जाने का सफर, यथार्थ को पर्दे पर देखने का सफर, अपने पागलपन को जीवंत करने का सफर। अब नये लोग होंगे, नए विचार और नए तौर-तरीके होंगे लेकिन बात वही है ख्वाब वही है। गिले-शिकवे, मनमुटाव और क्रोध, विश्व के हर स्थान पर मौजूद हैं हम सब में भी हैं। ऐसा कई बार हुआ होगा जब मैं आपसे सहमत नहीं रहा हूँ और कई बार आप भी मुझसे असहमत रहे होंगे लेकिन यकीन मानिए वक्त ताकतवर है जो सही है उसे उड़ने से कोई रोक नहीं पाता और जो गलत है उसे ड़ुँबाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। आखिरकार हम सब एक साथ उस एक ख्वाब के लिए ही हैं ना जो हमने देखा बस वही एक सत्य है, वही यथार्थ है।
इस फिल्म में मोहित ने जो भूमिका निभाई उसके लिए एक निर्देशक निर्माता सह कलाकार नहीं बल्कि एक इंसान होने के नाते सलाम करता हूँ, भाई तुम्हें महादेव सारी खुशियाँ और एक ऊँचा मुकाम प्रदान करें। हर हर महादेव। चंदन तुमने भी कई बार मुझे अपने काम से आश्चर्यचकित किया है, जितना सफर तुमने तय किया उतना शायद किसी ने नहीं किया। तुम्हारे कई मिनट तक एक शॉट के लिए इतने दुर्गम स्थान पर खड़ा रहना, बर्फ मैं अकेले टिके रहना, कई बार तुम्हारी पीठ थपथपाना यह सब याद रहेगा मुझे। भोलेनाथ तुम्हें ढेर सारी खुशियाँ दें और तुम्हारी कला को दिन प्रतिदिन नयी ऊँचाइयाँ और प्रखरता दे। उत्कर्ष तुम्हारी लग्न और निपुणता तुम्हारी उम्र से कहीं ज्यादा विशेष है। तुम्हारा नयापन और मुझे सुनने समझने की कोशिश से हमेशा मैं खुश रहा हूँ, वक्त के साथ इसमें और स्थिरता आएगी देख लेना, इसी प्रकार मेहनत करते रहो, मुझे पूरा भरोसा है एक दिन तुम कुछ अच्छा कर लोगे। तुम्हे पता है, मैं तुमसे बहुत उम्मीद करता हूँ बस यह याद रखना।
और आप, ईशा "यथार्थ की कल्पना" तुम में एक कलाकार के रूप में वह सब कुछ है जो एक कहानीकार, एक निर्देशक, एक निर्माता और एक सह कलाकार हमेशा चाहता होगा। तुम्हारी स्थिरता, खामोशी, सादगी और समझदारी ने मुझे हर कदम पर हैरान किया है, ऐसा काफी कुछ मैं तुम्हें बता चुका हूँ लेकिन इस किरदार के लिये तुम्हारी लग्न और प्रतिबद्धता के लिए मैं तुम्हारा आभार और सम्मान करता हूँ। मैंने पहले ही कहा जो उसने तय किया उस से बेहतर कोई हो नहीं सकता और यह हकीकत है कि यथार्थ के लिए तुम से बेहतर कल्पना कोई हो ही नहीं सकती थी क्योंकि आज के दौर में कलाकार तो सब है लेकिन हर किसी की किस्मत में कलाकार हो पाना नहीं है। तुम एक उत्कृष्ट कलाकार हो तुमने जितने मिथक खुद से तोड़े हैं इस फिल्म के लिये मैं समझता हूँ कितना मुश्किल रहा होगा वृंदावन आना तुम्हारे लिए पर तुमने अपने ड़र से लड़ना चुना है, यथार्थ की कल्पना हो जाना चुना है। मैं जानता हूँ आप अपनी कला और सादगी से एक दिन अपने हर ख्वाब को पूरा करोगे, लेकिन मैं तहे दिल से चाहूँगा कि उस कामयाबी में पहला पन्ना यथार्थ ही रहे और हाँ तुम हनुमान बनकर बहुत क्यूट लगते हो तो इस प्रकार इस फिल्म का दूसरा हनुमान है यथार्थ की कल्पना।
और मैं, मैं मेरे परिवार के बिना कुछ नहीं, कुछ भी नहीं। आज जो कुछ भी कर पाया उसके पीछे मेरा परिवार ही है, मैं घर से दूर जो कुछ भी कर सका वह सब इसलिए क्योंकि मैं जानता हूँ कि वहाँ घर में सब ठीक रहेगा। मेरे हर कदम के पीछे तुम्हारे कदम रहे हैं क्योंकि पीछे पलटने की मुझे जरूरत ही नहीं पड़ेगी। मैं जानता हूँ यह फिल्म उससे कहीं ज्यादा आपकी है क्योंकि मेरे सपने तो मेरे हैं लेकिन मैं, मैं सिर्फ खुद का नहीं तुम सबका हूँ। शुक्रिया शुक्रिया और सिर्फ शुक्रिया मुझे खुद से मिलाने के लिये।
यथार्थ, मैं पिछले 3 महीने से यथार्थ ही रहा हूँ, खुद को ना जाने कितने वर्षों बाद ऐसे देखा है। सब से छिपा कर रखा है कि जिस दिन मुझे कोई यथार्थ में देखे बस यही कहे कि यह सलिल तो नहीं है और एक कलाकार को क्या ही चाहिए? बहुत कुछ सीखा मैंने इस फिल्म से, खुद की ना जाने कितनी गलतियाँ सुधारी है, चुप रहना सीख लिया, हालातों के हिसाब से बर्ताव करना सीख लिया लेकिन as They Said, "A Tiger Never Changes His Stripes"...सो जो हूँ वह तो हमेशा रहुँगा बाकी जो बदल सकता था, बदल दिया है। मुझे नहीं पता यह फिल्म क्या ही बनेगी और क्या ही बदलेगी हम सबके लिए लेकिन एक बात है इसने मुझे इंसानों को समझने, जानने और सुनने की कला से और बेहतर रूबरू करा दिया। शायद अब मैं पहले से बेहतर इंसान हूँ पर यह तो जीवन है निरंतर बदलाव जारी रहते हैं और वह मुझ पर भी लागू है। अंत में सिर्फ इसी के साथ बात समाप्त करूँगा कि जैसे मैने हमेशा कहा कि यह फिल्म मैंने नहीं बनाई कृष्ण महादेव ने बनाई है, और यही सत्य आगे भी साथ रहेगा और जल्द ही आपके सामने लाएंगे यथार्थ को, तब तक के लिए चलो थोड़ा और आगे बढ़ते हैं। इस वादे के साथ कि जब भी मिलेंगे धमाके के साथ मिलेंगे। यथार्थ के साथ मिलेंगे और नए अंदाज में मिलेंगे।

- सलिल "यथार्थ" सिंह
राधे राधे !!
हर हर महादेव !!
See You At The Movies...!!

यथार्थ और उसकी दुनिया...❤

कहीं पढ़ा था एक बार मैने,  न किसी से ईर्ष्या न किसी से होड़,  मेरी अपनी मंज़िलें.. मेरी अपनी दौड़... मैं ऐसा ही तो हूँ।। वो कहते हैं ना कि वक...