27 मार्च 2018, एक सफर शुरु हुआ था।
2016 से 2018 तक मैने जो कुछ लघु फिल्मो से सीखा, उस से एक कदम आगे बढ़ने का दिल किया और फिर शुरु हुआ एक कभी ना खत्म होने वाला सफर, "चाय की दुकान" का, मेरी पहली फीचर फिल्म। यकीनन यह फिल्म जल्द ही पूरी होगी पर इस से जो मुझे हासिल हुआ है अभी तक वह जीवन भर चलेगा, शायद मृत्यू उपरांत भी।
एक फिल्म के लिये सबसे ज़रूरी क्या होता है, उसकी टीम। टीम के बिना कभी भी एक फिल्म पूरी नही हो सकती, दुनिया की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी परियोजना भी बिना टीम के पूरी नही हो सकती पर शायद अभी तक ऐसी टीम जोडने में मैं नाकामयाब रहा, जिसके रास्ते भी एक हो, सपने भी एक और मंजिल भी एक हो। यही सुना था कि एक फिल्मकार के लिये उसकी फिल्म उसका पहला बच्चा होता है, उसका पहला एहसास क्योंकि यह सपना उसने देखा होता है, एक एक लम्हा वो उन एहसासो से गुजरा होता है, और फिर उसमे रंग भरता है, इंसानी रूप रंग, जो एक टीम मिल कर करती है। यहाँ सब एक समान होते है, हाँ बस कुछ नये कुछ पुराने, कुछ अनजाने कुछ पहचाने। जैसे नदी एक दिशा में बहती है, फिल्म भी उसी भांति बनती जाती है, सबका रंग लिये, थोडा उसका थोडा इसका और सारे रंग जो फिल्मकार ने पिरोये थे, वो धीरे धीरे एक खुबसूरत चित्र का रूप लेने लगते है। अब जितने रंग उतनी विचारधारा, और इन सारी विचारधाराओ का संचालन करने वाला वो फिल्मकार, एक दिशा में ले कर बहने वाली उस नदी के समान पर वक़्त एक जैसा कहाँ रहता है, उसका पहिया ऐसा घुमता है कि अचानक सब बिखरने लगता है। "अहम" और "मैं" आपस में टकराने लगते है, सपने डगमगाने लगते है, जैसे नदी को किसी ने रोक दिया हो चाहे बाँध बनाके या फिर अहम की इतनी गर्मी से, कि नदी सूखने लग जाये। एक पश्चिमी महान फिल्मकार ने कहा है, "फिल्मकार बहुत अकेला होता है, जब वो कहानी और फिल्म के बिच भ्रमण करता है, और यह अकेलापन बेहद रोमांचित होता है पर जब उसके अपने, उसका साथ छोड देते है, तब वह बेहद अकेला हो जाता है, और यह अकेलापन बेहद दुख देने वाला होता है"। शायद ऐसा हर एक कलाकार के साथ ही होता होगा, मेरे साथ भी यह घट रहा तो कोई खास बात नही। मेरे एक साथी फिल्मकार मित्र ने मुझसे कुछ महीनो पहले शिकायत की, कि किसी को फिल्म दिखाने का मन नही करता सब मतलबी हो गये है तब मैं खामोश रहा पर कुछ ही महीनो में हालात बदल गये, और यही प्रश्न मैने उसे पुछा तो उसने कहा कि ऐसा ही होता है, कामयाब फिल्म के साथ सब खड़े होना चाहते है और नाकामयाब या अधर में लटकी फिल्म के साथ कोई खड़ा नही होना चाहता फिर चाहे उनकी शुरुआत आप से ही क्यूँ ना हुई हो, सब आप से पूछना चाहेंगे कि फिल्म का क्या हुआ..? फिल्म कब आयेगी..? पर कोई आप का काम बाटने नही आयेगा, वो आपको राय देंगे पर आपका साथ नही, अपको ज्ञान देंगे पर आपके पास नही रहेंगे। आपके अलावा बहुत संभावनाए उन्हे बाहरी दुनिया में मिल जाती है फिर वो साथ क्यूँ रहना चाहेंगे जहाँ ना इतनी सफलता है और ना पैसा। धीरे धीरे सब ऐसे ही दूर चले जाते है, हर हादसा और किस्सा फिल्मकार के जहन में रहता है, ऐसे ही वो अकेला, बहुत अकेला हो जाता है।
मैं भी अकेला हो गया हूँ, पर ऐसा नही है कि मैने कोशिश नही की, बस खुद के यकीन से हार गया, शायद इंसान गलत थे या मेरे तरीके खैर दो वर्ष हो रहे है और अभी भी फिल्म थोड़ी अधूरी है, यह फिल्म मेरा सपना थी, इसके पूरे होने तक मैं इस से एक पल दूर नही रह सकता, चाह कर भी नही क्योंकि अब बस मैं हूँ जो इस फिल्म के साथ जिन्दा हूँ और क्योंकि जिन्दा हूँ तो फिर यही काफी है। सपना मेरा है, मुझे तो पूरा करना होगा। इस फिल्म में एक डायलोग था, मेरी इस से जुड़ी यादें भी वैसी ही हो गयी है, कुछ मीठी कुछ कड़वी और अब कुछ फीकी। फिल्म के साथ जुड़े हर शख्श का पहले कई बार धन्यवाद कर चुका हूँ, पर अब मन नही है। महान कलाकार, अल पचिनो ने एक इंटरव्यू में कहा था,
मैं भी अकेला हो गया हूँ, पर ऐसा नही है कि मैने कोशिश नही की, बस खुद के यकीन से हार गया, शायद इंसान गलत थे या मेरे तरीके खैर दो वर्ष हो रहे है और अभी भी फिल्म थोड़ी अधूरी है, यह फिल्म मेरा सपना थी, इसके पूरे होने तक मैं इस से एक पल दूर नही रह सकता, चाह कर भी नही क्योंकि अब बस मैं हूँ जो इस फिल्म के साथ जिन्दा हूँ और क्योंकि जिन्दा हूँ तो फिर यही काफी है। सपना मेरा है, मुझे तो पूरा करना होगा। इस फिल्म में एक डायलोग था, मेरी इस से जुड़ी यादें भी वैसी ही हो गयी है, कुछ मीठी कुछ कड़वी और अब कुछ फीकी। फिल्म के साथ जुड़े हर शख्श का पहले कई बार धन्यवाद कर चुका हूँ, पर अब मन नही है। महान कलाकार, अल पचिनो ने एक इंटरव्यू में कहा था,
“I don't regret anything. I feel like I've made what I would call mistakes. I picked the wrong movie, wrong peoples or I didn't pursue the correct things, but everything you do is part of you and you get something from it at the end." इसलिये मुझे काफी कुछ मिल गया है, हाँ थोडा परेशान हूँ, थक भी गया हूँ और शायद हारा हुआ भी पर पिछ्ले कुछ दिन कुछ महीनो में जिस दौर से गुजर के आया हूँ, उसने बेहद बदल दिया है मुझको, कहते है ना,
"Forget the career, do the work. If you feel what you are doing is on line and you’re going someplace and you have a vision and you stay with it, eventually things will happen.”
नीचे फिल्म "चाय की दुकान" के कुछ दृश्य जोड़ रहा हूँ। धन्यवाद।
- सलिल सिंह, 27 मार्च 2020
"Forget the career, do the work. If you feel what you are doing is on line and you’re going someplace and you have a vision and you stay with it, eventually things will happen.”
नीचे फिल्म "चाय की दुकान" के कुछ दृश्य जोड़ रहा हूँ। धन्यवाद।
- सलिल सिंह, 27 मार्च 2020


