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Thursday, March 26, 2020

Yes, i am not Well.

27 मार्च 2018, एक सफर शुरु हुआ था। 
2016 से 2018 तक मैने जो कुछ लघु फिल्मो से सीखा, उस से एक कदम आगे बढ़ने का दिल किया और फिर शुरु हुआ एक कभी ना खत्म होने वाला सफर, "चाय की दुकान" का, मेरी पहली फीचर फिल्म। यकीनन यह फिल्म जल्द ही पूरी होगी पर इस से जो मुझे हासिल हुआ है अभी तक वह जीवन भर चलेगा, शायद मृत्यू उपरांत भी। 
एक फिल्म के लिये सबसे ज़रूरी क्या होता है, उसकी टीम। टीम के बिना कभी भी एक फिल्म पूरी नही हो सकती, दुनिया की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी परियोजना भी बिना टीम के पूरी नही हो सकती पर शायद अभी तक ऐसी टीम जोडने में मैं नाकामयाब रहा, जिसके रास्ते भी एक हो, सपने भी एक और मंजिल भी एक हो। यही सुना था कि एक फिल्मकार के लिये उसकी फिल्म उसका पहला बच्चा होता है, उसका पहला एहसास क्योंकि यह सपना उसने देखा होता है, एक एक लम्हा वो उन एहसासो से गुजरा होता है, और फिर उसमे रंग भरता है, इंसानी रूप रंग, जो एक टीम मिल कर करती है। यहाँ सब एक समान होते है, हाँ बस कुछ नये कुछ पुराने, कुछ अनजाने कुछ पहचाने। जैसे नदी एक दिशा में बहती है, फिल्म भी उसी भांति बनती जाती है, सबका रंग लिये, थोडा उसका थोडा इसका और सारे रंग जो फिल्मकार ने पिरोये थे, वो धीरे धीरे एक खुबसूरत चित्र का रूप लेने लगते है। अब जितने रंग उतनी विचारधारा, और इन सारी विचारधाराओ का संचालन करने वाला वो फिल्मकार, एक दिशा में ले कर बहने वाली उस नदी के समान पर वक़्त एक जैसा कहाँ रहता है, उसका पहिया ऐसा घुमता है कि अचानक सब बिखरने लगता है। "अहम" और "मैं" आपस में टकराने लगते है, सपने डगमगाने लगते है, जैसे नदी को किसी ने रोक दिया हो चाहे बाँध बनाके या फिर अहम की इतनी गर्मी से, कि नदी सूखने लग जाये। एक पश्चिमी महान फिल्मकार ने कहा है, "फिल्मकार बहुत अकेला होता है, जब वो कहानी और फिल्म के बिच भ्रमण करता है, और यह अकेलापन बेहद रोमांचित होता है पर जब उसके अपने, उसका साथ छोड देते है, तब वह बेहद अकेला हो जाता है, और यह अकेलापन बेहद दुख देने वाला होता है"। शायद ऐसा हर एक कलाकार के साथ ही होता होगा, मेरे साथ भी यह घट रहा तो कोई खास बात नही। मेरे एक साथी फिल्मकार मित्र ने मुझसे कुछ महीनो पहले शिकायत की, कि किसी को फिल्म दिखाने का मन नही करता सब मतलबी हो गये है तब मैं खामोश रहा पर कुछ ही महीनो में हालात बदल गये, और यही प्रश्न मैने उसे पुछा तो उसने कहा कि ऐसा ही होता है, कामयाब फिल्म के साथ सब खड़े होना चाहते है और नाकामयाब या अधर में लटकी फिल्म के साथ कोई खड़ा नही होना चाहता फिर चाहे उनकी शुरुआत आप से ही क्यूँ ना हुई हो, सब आप से पूछना चाहेंगे कि फिल्म का क्या हुआ..? फिल्म कब आयेगी..? पर कोई आप का काम बाटने नही आयेगा, वो आपको राय देंगे पर आपका साथ नही, अपको ज्ञान देंगे पर आपके पास नही रहेंगे। आपके अलावा बहुत संभावनाए उन्हे बाहरी दुनिया में मिल जाती है फिर वो साथ क्यूँ रहना चाहेंगे जहाँ ना इतनी सफलता है और ना पैसा। धीरे धीरे सब ऐसे ही दूर चले जाते है, हर हादसा और किस्सा फिल्मकार के जहन में रहता है, ऐसे ही वो अकेला, बहुत अकेला हो जाता है। 
मैं भी अकेला हो गया हूँ, पर ऐसा नही है कि मैने कोशिश नही की, बस खुद के यकीन से हार गया, शायद इंसान गलत थे या मेरे तरीके खैर दो वर्ष हो रहे है और अभी भी फिल्म थोड़ी अधूरी है, यह फिल्म मेरा सपना थी, इसके पूरे होने तक मैं इस से एक पल दूर नही रह सकता, चाह कर भी नही क्योंकि अब बस मैं हूँ जो इस फिल्म के साथ जिन्दा हूँ और क्योंकि जिन्दा हूँ तो फिर यही काफी है। सपना मेरा है, मुझे तो पूरा करना होगा। इस फिल्म में एक डायलोग था, मेरी इस से जुड़ी यादें भी वैसी ही हो गयी है, कुछ मीठी कुछ कड़वी और अब कुछ फीकी। फिल्म के साथ जुड़े हर शख्श का पहले कई बार धन्यवाद कर चुका हूँ, पर अब मन नही है। महान कलाकार, अल पचिनो ने एक इंटरव्यू में कहा था,
“I don't regret anything. I feel like I've made what I would call mistakes. I picked the wrong movie, wrong peoples or I didn't pursue the correct things, but everything you do is part of you and you get something from it at the end." इसलिये मुझे काफी कुछ मिल गया है, हाँ थोडा परेशान हूँ, थक भी गया हूँ और शायद हारा हुआ भी पर पिछ्ले कुछ दिन कुछ महीनो में जिस दौर से गुजर के आया हूँ, उसने बेहद बदल दिया है मुझको, कहते है ना,
"Forget the career, do the work. If you feel what you are doing is on line and you’re going someplace and you have a vision and you stay with it, eventually things will happen.”

नीचे फिल्म "चाय की दुकान" के कुछ दृश्य जोड़ रहा हूँ। धन्यवाद।

- सलिल सिंह, 27 मार्च 2020



Tuesday, January 28, 2020

The Struggle Was Real But I Survived..

Today, 24th Of November 2019, i have to share something with you..
Past twenty days were really annoying for me as I was diagnosed with a disease with a scary name, Bell's Palsy, that commonly known as "Facial Paralysis". I was in a Nainital for some peace after a long hike up of Five months involved with disturbances, stress, mental issues, family dramas and tussles with inner peace, i was happy as somewhere i was recovering with peace but as they said, time has always something for you and on my return back to home, a sudden brain stroke damage my one of the cranial nerve on 4th of November.
As soon as i hold myself, i was Admitted in Bareilly and started with my treatment but as an actor, your face has your biggest value and your pride, face is the biggest weapon of an actor. When i saw my right side of face was not working, from forehead to eyes, from nose to teeth, from lips to ear, not even a single part is working, it was psychologically disturbing.
Doctor advised me to stop working and doing anything which needs my brain, everything for next 1 month, they said, you need a complete rest because this involves brain, and what i always do the best is, thinking stories, films, ideas, and creating my own dramatic & mystic world.
Too painful and stressful was that time, when they said not to take stress, spending those hours with no work but has so many worries was like a different world for me in last some days. Physiotherapy, two times a day is a daily schedule from then to till now. Heavy dose steroids and antiviral tablets creates havoc in my body, loses many night sleeps but now when i am writing this, i must admit, more than physical this was a mental fight to stand against all odds. This has not been a easy phase of my life as I've seen and experienced many things in the past few days, I am recovered more than 90% of cosmetic damage, and internal damage will take almost one more month to regenerate nerves. I have successfully won the major fight and now looking forward to better, stress free, healthy and happy life. Fighting these kind of brain disease is not easy and the all you need is love, care, hope and affection. Though i had decided not to share this trauma with anyone except family during initial days, but really thankful to those few who stood by me like always. My family, I can't thank you enough. Thank you each one of you for standing by me like a rock and making me feel special and truly blessed.

And special Thanks to my Doctor's Dr. Sanjeev Gupta(M.D, D.M(Neuro)),
Dr. Sunil Kathuria And my Physiotherapists Dr. Vaibhav Sharma (Bareilly) & Dr. Narendra Sharma (Aligarh).

Now, as I am entering new life after this uninvited hiccup, the biggest lesson i learned this year is to not force anything, conversations, friendships, relationships, attentions, love. Anything forces is just not worth fighting for, whatever flows flows, what crashes crashes. It is what it is. Forgive me who's hurt because of me, and i forgive those who hurts me, its a small life, so back to the reality. Depression, Stress these are big words, actually very big, peace of mind matters the most in life, i beleive in fight back & As of now, i am looking forward to make better films and tell better stories.

यही फ़लसफ़ा है, ज़िन्दगी का,
सुबह ही होती है, हर शाम के बाद..
जीना आसां हो ही जायेगा,
जो मुस्कुराने की काला आ जाये, हर आँसू के बाद..


Salil Singh.

24 Nov. 2019

Monday, July 22, 2019

Shahad Wala Karela..!!

आज कुछ सुन रहा था, तभी एक बात कानो में चुभी,
अच्छे और सच्चे इंसान की परख क्या होनी चाहिए? 
यह सवाल मेरे जैसे हजारों लाखो लोगो के लिए ऐसे है जैसे, सन्यास से पहले सन्यासी को यह पता लगना की जीवन भोग विलास, मोह-माया, क्रोध और लालसा का नाम नही, अपितु इनसे मुक्त होना है।
खैर बात आगे बड़ी तो एक बात अच्छी सी लगी, कि आजकल इंसानो मे शहद वाला करेला बहुत पसंद किया जाता है, एकाएक यही हकीकत है।
तो बात करते है, "शहद वाला करेला" की, तो यह एक एहसास ही समझ लो आप जो हर इंसान में किसी दूसरे इंसान के लिए होता है, गहराई में उतरे तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि ऐसे इंसान जो अपनी आवश्यकता य़ा भावनाओ के अनुसार अपने एहसास को शहद की तरह मीठा और सुगंधित रखते है, पर अंदर से करेले जैसे कड़वे होते है, तो जब तक आवश्यकता महसूस होती है वो दुनिया के सबसे प्यारे और ज़रूरी इंसान होते है, पर करेला तो आदत से मजबूर कड़वा ही है, कड़वाहट महसूस करायेगा ही, पर दूजा इंसान इसी परेशानी में रहता है कि अब पहले जैसी बात क्यूँ नहीं, अब सब बदल क्यूँ गया है, अलग अलग क्यूँ महसूस होता है पहले तो सब अच्छा था, अब अचानक सब बदल कैसे गया...? इतने सारे सवालो में घिर कर इंसान लड़ते झगड़ते मान लेता है कि उसने ही गलती कर दी, पर ऐसा नहीं है की करेला अच्छा नहीं होता, में बहुत से करेलो को भी जानता हूँ जो जैसे है वैसे है, ज़रूरत ही नहीं शहद की, क्यूँकी उनकी ऐसी ही आदत है हमको, वो ज़रूरी भी है और ख़ास भी.. कहते है ना कड़वा है पर सच्चा है...।
मेरे जीवन में भी ऐसे इंसानो की भरमार है जो शहद वाले करेले है, और कुछ सिर्फ करेले है, करेले जो तकलीफ देते है, वो कम से कम है सामने तो है और मुझे उम्मीद है उनसे की वो ऐसा कर भी सकते है पर शहद के करेले, इन से बड़ा ड़र लगता है और यकिनन सबको लगता होगा।
अहम यह नहीं की करेला जैसा होना गलत है, अहम यह है कि जैसे हो वैसे रहो ना, कुछ पल अच्छे बन के किसी की भावनाओ से खेलने, य़ा किसी के विश्वास को तोड़ने की ज़रूरत ही क्या है? की आज आपको कुछ गलत महसूस हुआ तो आपने अपने फैसले दूसरो पर थोप दिये और बहाना बना दिया उम्मीद का, स्वयं विचार कीजिये, अच्छी बात तो नहीं ये।
इंसान का सच उसके पहले क्रोध वाले वर्ताब से ज़ाहीर होता है, क्यूँकी शहद मे ड़ूबे करेले से जब शहद गायब होता है, वो रुप असली करेले से ज़्यादा तकलीफ देता है, आखिर कोई कितना दिन अभिनय कर सकता है, एक दिन जब असली चेहरा सामने आता है, हैरत भी होती है और विश्वास भी नहीं होता. पीतल पीतल होती है फिर चाहे कितना भी सोने का पानी चड़ा दो.. और सोना सोना होता है.. खरा और सच्चा..।
लोग अक्सर पूछते है कि बताओ इस वर्ष आपने क्या सीखा, तो जवाब यह है की 2018 - 19 का सबसे अनमोल अनुभव यही हुआ, कि नकली असली की थोडी पहचान हमने करनी सीख ली.
चलो इसी बात पर एक एक करेले के जूस का कड़वा घूट हो जाये... चियर्स...
- सलिल सिँह

Friday, March 22, 2019

महंगे किरदार और सस्ते चरित्र..!!

   आजकल किरदार महंगे और चरित्र बहुत सस्ते हो गए है, सिर्फ नाजुक से शब्दों से यह चरित्र टूट कर मिट्टी में मिल जाते है वो भी ऐसे मनुष्य और सोच के लिए जो ना माएने रखते और ना ही हमारे किसी लायक। क्या कोई दूसरा हमारा चरित्र प्रमाणित करेगा जो खुद अंदर से खोखला हो एहसासों के नाम पर?
गलतफहमी और एहसासों के अभाव में किरदार और चरित्र को मिला कर अगर आप अपने एहसास को ब्यान अपने शब्दों में करते हो तो वो भी इतने ही खोखले है जितने आपकी अच्छी सोच पर आपका गलत आचरण क्यूंकी कमल कीचड़ में खिल कर गंदा नहीं खास हो जाता है पर अगर आप कमल ना बन कर सिर्फ कीचड़ के लिए अपना सारा व्यवहार और अपना सारा कीमती वक़्त दे रहे तो यह आपकी भूल है और कोई दूसरा आपको यह एहसास करा ही नहीं सकता जब तक आप स्वयं ना एहसास कर ले। मित्रता सिर्फ एक कंबल नहीं ज़िसकी आड़ में आप सच और अपनी गलतियां छूपा कर उम्मीद करते रहे की कोई आपसे कुछ ना कहे और आप अपने महंगे किरदार में खोये रहें। वक़्त का सिलसिला और दिल में एहसास को तवज्जो दी जाए तो बेहतर है, क्यूंकी चरित्र और किरदार आपकी समझ और सोच से बेहतर बनते है, किसी दुसरे के प्रमाणित करने से नहीं।
कौन आपको सही कौन आपको गलत समझ रहा यह भी अगर आप तय करना चाहते है तो माफ कीजिये आप खुद के किरदार और चरित्र का हनन कर रहे है और फिर उसमे अपनी नाकामी को छूपा कर अपने वक़्त और हालातो का दोष बता कर आप खुद के साथ उस हर शख्स को तकलीफ दे रहे है जाने अंजाने में जो आपके बुरे वक़्त में आपके साथ है। मिट्टी के खिलोने जैसे इन नाजुक किरदारो और चरित्र से बाहर आकर खुद को नए सिरे से ढून्ढिये, मत भूलिये जब भूकंप और सुनामी कुदरत को तबाह करते है तब पृथ्वी उन्हे दोष नहीं देती और ना भूकंप सुनामी पृथ्वी और उसके मनुष्यो से चरित्र प्रमाण मांगते है। जो गलत है वो गलत है, सच बस यह है कि जो होना है होगा बस. कुदरत की तरह दोबारा खड़ा होना और स्वयं परवान चड़ना सिखिये, रुकिये मत। अक्सर रुकने वालो से ही दुनिया रास्ता पूछ कर आगे बड़ जाती है।

नोट: यह मत कहो की सब अपने हालातों से सीख कर समझते है, आप हमारे हालातों में नही, आप नही समझोगे, जानता हूँ यह सच है पर जो कोई आप से पहले इन हालातो से गुजर चुका हो और आपसे बेहतर समझता हो तो उसे मानिये और समझिये क्यूंकी फिर गीता, पुराण, वेद और उपनिषद में लिखी कही बाते जो आप मान लेते हो वो आपने नही लिखी, ना आपने जी है। शब्दों पर ना जा कर यह समझिये की हमने आपके सामने गन्ना रख दिया है, गर्मी आ रही है, तो इस बहाने से अपनी गर्मी निकालिये। गन्ना निचोड कर रस आपको ही निकाल कर पीना पड़ेगा, समझ सके तो मीठा नहीं तो अंदर चल रहे मन्थन से विष भी निकल सकता है और माफ कीजियेगा यहाँ अब कोई ये विष पी कर आपको अम्रत तो देने नही वाला...

- सलिल सिंह
22 मार्च 2019

यथार्थ और उसकी दुनिया...❤

कहीं पढ़ा था एक बार मैने,  न किसी से ईर्ष्या न किसी से होड़,  मेरी अपनी मंज़िलें.. मेरी अपनी दौड़... मैं ऐसा ही तो हूँ।। वो कहते हैं ना कि वक...