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Monday, July 22, 2019

Shahad Wala Karela..!!

आज कुछ सुन रहा था, तभी एक बात कानो में चुभी,
अच्छे और सच्चे इंसान की परख क्या होनी चाहिए? 
यह सवाल मेरे जैसे हजारों लाखो लोगो के लिए ऐसे है जैसे, सन्यास से पहले सन्यासी को यह पता लगना की जीवन भोग विलास, मोह-माया, क्रोध और लालसा का नाम नही, अपितु इनसे मुक्त होना है।
खैर बात आगे बड़ी तो एक बात अच्छी सी लगी, कि आजकल इंसानो मे शहद वाला करेला बहुत पसंद किया जाता है, एकाएक यही हकीकत है।
तो बात करते है, "शहद वाला करेला" की, तो यह एक एहसास ही समझ लो आप जो हर इंसान में किसी दूसरे इंसान के लिए होता है, गहराई में उतरे तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि ऐसे इंसान जो अपनी आवश्यकता य़ा भावनाओ के अनुसार अपने एहसास को शहद की तरह मीठा और सुगंधित रखते है, पर अंदर से करेले जैसे कड़वे होते है, तो जब तक आवश्यकता महसूस होती है वो दुनिया के सबसे प्यारे और ज़रूरी इंसान होते है, पर करेला तो आदत से मजबूर कड़वा ही है, कड़वाहट महसूस करायेगा ही, पर दूजा इंसान इसी परेशानी में रहता है कि अब पहले जैसी बात क्यूँ नहीं, अब सब बदल क्यूँ गया है, अलग अलग क्यूँ महसूस होता है पहले तो सब अच्छा था, अब अचानक सब बदल कैसे गया...? इतने सारे सवालो में घिर कर इंसान लड़ते झगड़ते मान लेता है कि उसने ही गलती कर दी, पर ऐसा नहीं है की करेला अच्छा नहीं होता, में बहुत से करेलो को भी जानता हूँ जो जैसे है वैसे है, ज़रूरत ही नहीं शहद की, क्यूँकी उनकी ऐसी ही आदत है हमको, वो ज़रूरी भी है और ख़ास भी.. कहते है ना कड़वा है पर सच्चा है...।
मेरे जीवन में भी ऐसे इंसानो की भरमार है जो शहद वाले करेले है, और कुछ सिर्फ करेले है, करेले जो तकलीफ देते है, वो कम से कम है सामने तो है और मुझे उम्मीद है उनसे की वो ऐसा कर भी सकते है पर शहद के करेले, इन से बड़ा ड़र लगता है और यकिनन सबको लगता होगा।
अहम यह नहीं की करेला जैसा होना गलत है, अहम यह है कि जैसे हो वैसे रहो ना, कुछ पल अच्छे बन के किसी की भावनाओ से खेलने, य़ा किसी के विश्वास को तोड़ने की ज़रूरत ही क्या है? की आज आपको कुछ गलत महसूस हुआ तो आपने अपने फैसले दूसरो पर थोप दिये और बहाना बना दिया उम्मीद का, स्वयं विचार कीजिये, अच्छी बात तो नहीं ये।
इंसान का सच उसके पहले क्रोध वाले वर्ताब से ज़ाहीर होता है, क्यूँकी शहद मे ड़ूबे करेले से जब शहद गायब होता है, वो रुप असली करेले से ज़्यादा तकलीफ देता है, आखिर कोई कितना दिन अभिनय कर सकता है, एक दिन जब असली चेहरा सामने आता है, हैरत भी होती है और विश्वास भी नहीं होता. पीतल पीतल होती है फिर चाहे कितना भी सोने का पानी चड़ा दो.. और सोना सोना होता है.. खरा और सच्चा..।
लोग अक्सर पूछते है कि बताओ इस वर्ष आपने क्या सीखा, तो जवाब यह है की 2018 - 19 का सबसे अनमोल अनुभव यही हुआ, कि नकली असली की थोडी पहचान हमने करनी सीख ली.
चलो इसी बात पर एक एक करेले के जूस का कड़वा घूट हो जाये... चियर्स...
- सलिल सिँह

Friday, March 22, 2019

महंगे किरदार और सस्ते चरित्र..!!

   आजकल किरदार महंगे और चरित्र बहुत सस्ते हो गए है, सिर्फ नाजुक से शब्दों से यह चरित्र टूट कर मिट्टी में मिल जाते है वो भी ऐसे मनुष्य और सोच के लिए जो ना माएने रखते और ना ही हमारे किसी लायक। क्या कोई दूसरा हमारा चरित्र प्रमाणित करेगा जो खुद अंदर से खोखला हो एहसासों के नाम पर?
गलतफहमी और एहसासों के अभाव में किरदार और चरित्र को मिला कर अगर आप अपने एहसास को ब्यान अपने शब्दों में करते हो तो वो भी इतने ही खोखले है जितने आपकी अच्छी सोच पर आपका गलत आचरण क्यूंकी कमल कीचड़ में खिल कर गंदा नहीं खास हो जाता है पर अगर आप कमल ना बन कर सिर्फ कीचड़ के लिए अपना सारा व्यवहार और अपना सारा कीमती वक़्त दे रहे तो यह आपकी भूल है और कोई दूसरा आपको यह एहसास करा ही नहीं सकता जब तक आप स्वयं ना एहसास कर ले। मित्रता सिर्फ एक कंबल नहीं ज़िसकी आड़ में आप सच और अपनी गलतियां छूपा कर उम्मीद करते रहे की कोई आपसे कुछ ना कहे और आप अपने महंगे किरदार में खोये रहें। वक़्त का सिलसिला और दिल में एहसास को तवज्जो दी जाए तो बेहतर है, क्यूंकी चरित्र और किरदार आपकी समझ और सोच से बेहतर बनते है, किसी दुसरे के प्रमाणित करने से नहीं।
कौन आपको सही कौन आपको गलत समझ रहा यह भी अगर आप तय करना चाहते है तो माफ कीजिये आप खुद के किरदार और चरित्र का हनन कर रहे है और फिर उसमे अपनी नाकामी को छूपा कर अपने वक़्त और हालातो का दोष बता कर आप खुद के साथ उस हर शख्स को तकलीफ दे रहे है जाने अंजाने में जो आपके बुरे वक़्त में आपके साथ है। मिट्टी के खिलोने जैसे इन नाजुक किरदारो और चरित्र से बाहर आकर खुद को नए सिरे से ढून्ढिये, मत भूलिये जब भूकंप और सुनामी कुदरत को तबाह करते है तब पृथ्वी उन्हे दोष नहीं देती और ना भूकंप सुनामी पृथ्वी और उसके मनुष्यो से चरित्र प्रमाण मांगते है। जो गलत है वो गलत है, सच बस यह है कि जो होना है होगा बस. कुदरत की तरह दोबारा खड़ा होना और स्वयं परवान चड़ना सिखिये, रुकिये मत। अक्सर रुकने वालो से ही दुनिया रास्ता पूछ कर आगे बड़ जाती है।

नोट: यह मत कहो की सब अपने हालातों से सीख कर समझते है, आप हमारे हालातों में नही, आप नही समझोगे, जानता हूँ यह सच है पर जो कोई आप से पहले इन हालातो से गुजर चुका हो और आपसे बेहतर समझता हो तो उसे मानिये और समझिये क्यूंकी फिर गीता, पुराण, वेद और उपनिषद में लिखी कही बाते जो आप मान लेते हो वो आपने नही लिखी, ना आपने जी है। शब्दों पर ना जा कर यह समझिये की हमने आपके सामने गन्ना रख दिया है, गर्मी आ रही है, तो इस बहाने से अपनी गर्मी निकालिये। गन्ना निचोड कर रस आपको ही निकाल कर पीना पड़ेगा, समझ सके तो मीठा नहीं तो अंदर चल रहे मन्थन से विष भी निकल सकता है और माफ कीजियेगा यहाँ अब कोई ये विष पी कर आपको अम्रत तो देने नही वाला...

- सलिल सिंह
22 मार्च 2019

यथार्थ और उसकी दुनिया...❤

कहीं पढ़ा था एक बार मैने,  न किसी से ईर्ष्या न किसी से होड़,  मेरी अपनी मंज़िलें.. मेरी अपनी दौड़... मैं ऐसा ही तो हूँ।। वो कहते हैं ना कि वक...